Thursday, September 29, 2022

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तिरंगे को कैसे मोङा जाता है: जान लीजिए इसे मोङने और फहराने की विधि

हम जानते हैं कि किसी भी देश के लिए उसके राष्ट्रीय ध्वज का काफी महत्व होता है, क्योंकि यह देश की स्वतंत्रता का प्रतीक माना जाता है। जी हां, राष्ट्रीय ध्वज एक ऐसा ध्वज होता है, जिससे किसी भी देश की शान, आबरू तथा मान-सम्मान जुड़ी होती है। भारत का राष्ट्रीय ध्वज तीन रंगों से बना झंडा है, जिसे हम तिरंगा कहते है।

तिरंगा फहराते वक्त कुछ नियम और निर्देश बनाए गए हैं जिसका पालन करना बेहद आवश्यक होता है। उन्हीं नियमों में एक बहुत महत्वपूर्ण ये होता है कि झंडे को मोङा कैसे जाएं…ताकि फहराते वक्त झंडा सही से फहरे और उसके तीनों रंग नियमानुसार ऊपर से नीचे की ओर हों। आज के इस पेशकश में हम आपको झंडे को मोङने की विधि बताएंगे और साथ में एक वीडियो भी साझा करेंगे ताकि आपको सीखने में सहूलियत हो।

कैसे फहराएं अपना तिरंगा?

हम जानते हैं कि, हमारा देश भारत 15 अगस्त 1947 को ब्रिटिश शासन काल से आजाद हुआ था। इस आजादी में देश के कई वीरों तथा कई वीरांगनाओं ने अपनी जान की कुर्बानी दी थी। इसी कुर्बानी को याद करते हुए हम प्रत्येक साल 15 अगस्त और 26 जनवरी के दिन अपने राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे को बड़ी शान से फहराते हैं और उन वीरों तथा उन वीरांगनाओं की कुर्बानी को सलाम करते हैं।

  • ऐसा करना हो सकता है कानूनन अपराध
  • तिरंगे का इस्तेमाल किसी सामान या बिल्डिंग बगैरह को ढकने में नहीं किया जा सकता।
  • तिरंगा को फहराते समय इस बात का ध्यान देना होगा कि किसी भी स्थिति में तिरंगा जमीन से टच न हो।
  • तिरंगे को किसी गाड़ी के पीछे, प्लेन में या जहाज में नहीं लगाया जा सकता।
  • तिरंगे से ऊपर किसी अन्य झंडे को नहीं रख सकते।
  • किसी भी प्रकार की यूनिफॉर्म या सजावट के लिए तिरंगा का प्रयोग नहीं किया जा सकता

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तिरंगे को लेकर पहले और अब के नियम में कुछ बदलाव जो इस प्रकार हैं:-

पहले तिरंगा को लेकर एक नियम था कि इसे सिर्फ सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक ही फहराया जा सकता था लेकिन अब यह नियम बदल दिया गया है इसे दिन रात 24 घंटे फहराया जा सकता है।

पहले राष्ट्रीय ध्वज को लेकर यह नियम था कि आम लोग सिर्फ स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर ही अपने ध्वज को फहरा सकते थे लेकिन वर्ष 2002 में इंडियन फ्लैग कोड में बदलाव किया गया। 2002 के बाद कोई भी नागरिक किसी भी दिन झंडे को फहरा सकता है।

पहले आप मशीन से तथा पॉलिस्टर से बने ध्वज को नहीं फहरा सकते थे लेकिन अब पॉलिएस्टर, ऊन, कपास और रेशमी खादी से बने ध्वज को फहराने की भी अनुमति दे दी गई है।

जब तक सरकार के तरफ से झंडे को आधा झुकाकर फहराने के आदेश जारी नहीं किए गए तब तक तिरंगे को कभी भी आधा झुकाकर नहीं फहराया जा सकता।

तिरंगे का आकार आयताकार न होकर लंबाई और चौड़ाई 3 अनुपात 2 की होनी चाहिए।

तिरंगे को कभी भी पानी में डुबोया नहीं जा सकता यानी कभी भी इसे फिजिकल डैमेज नहीं पहुंचा सकते हैं।

तिरंगे में केसरिया रंग को नीचे की तरफ करके ध्वज को नहीं फहराया जा सकता।

तिरंगा अगर फट जाए या फिर मैला हो जाए तो उसे नहीं फहरा सकते हैं। एकांत में जाकर उसे मर्यादित तरीके से नष्ट करना चाहिए

वीडियो यहाँ देखें:-👇👇

तीन रंगों से बना तिरंगा

इस तिरंगे में सबसे ऊपर केसरिया रंग शामिल होता है, जो कि साहस और बलिदान का प्रतिक माना जाता है। बीच में सफेद रंग शामिल होता है, जो शांति और पवित्रता का प्रतिक माना जाता है तथा सबसे नीचे हरा रंग शामिल होता है, जो हरियाली का प्रतिक माना जाता है। यह तीनों रंग समानुपात में होते हैं।

ध्‍वज की लंबाई और चौड़ाई का अनुपात 3:2 का होता है। तिरंगे के सबसे बीच में यानी सफेद रंग के बीच में गहरे नीले रंग का एक चक्र बना होता है। यह चक्र अशोक की राजधानी के सारनाथ के शेर के स्‍तंभ पर बना हुआ है, इसलिए इसे अशोक चक्र कहते है। इसके चक्र का व्‍यास लगभग सफेद रंग की पट्टी के चौड़ाई के बराबर होता है और इस चक्र में 24 तीलियां होती है।

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तिरंगा हमारी शान, हमारी पहचान

तिरंगा हमारे देश की शान तथा हर भारतीय की पहचान होता है। यह हमारे देश की एकता, समृद्धि और विकास को दर्शाता है। यह तिरंगा हमें उन वीरों, भारत मां के उन सपूतो की याद दिलाती है, जिन्होंने इस तिरंगे के पीछे अपनी जान की कुर्बानी निछावर कर दी थी। जब यह तिरंगा हवा में लहराता है तो हमारे दिल में देश भक्ति की जुनून को जागृत करता है।

तिरंगे का इतिहास

हमारे देश का राष्ट्रीय ध्वज का स्वरूप कई बार बदला गया है। सन 1921 में महात्मा गांधी के द्वारा एक झंडे का बात कही गई थी, जिसके बाद पिंगली वैंकैया ने झंडे का डिजाइन बनाया था। यह डिजाइन आज के हमारे वर्तमान ध्वज के डिजाइन से अलग था। इसमें अशोक चक्र की जगह महात्मा गांधी का सूत काटने वाला चरखा बना हुआ था, जो स्वदेशी कपड़े को अपनाने के लिए महात्मा गांधी के द्वारा एक पहल थी तथा उनके अहिसात्मक स्वतंत्रता आंदोलन का प्रतीक भी थी। इस ध्वज को सन 1931 में पहली बार फहराया गया था। इसके बाद 22 जुलाई सन 1947 को संविधान सभा की बैठक में आज के हमारे वर्तमान ध्वज को अपनाया गया।

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