Wednesday, October 5, 2022

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इस लड़की ने प्लास्टिक, छिलके और कागज़ से बनाया इको फ्रेंडली ईंट, जो सस्ता और मजबूत भी है: पर्यावरण संरक्षण

जैसा की अप सब लोग जानते है की आज कल की युवा पीढ़ी एक तरफ स्मार्ट गैजेट्स में ही अपना सारा समय व्यर्थ कर देती है कुछ लोग ऐसे भी है जिन्हे पर्यावरण से बहुत लगाव है और वह पर्यावरण के प्रति अपनी जिमेदारी बखूबी समझते है और निभाते भी है। जो युवा पीढ़ी पर्यावरण के प्रति अपनी जिमेदारी समझती है वह आज कल नए नए तरीके अपनाकर लोगो को पर्यावरण के प्रति जागरूक कर रही है। तो आज हम बात करेंगे एक ऐसी ही लडकी की जिसने नया तरीका अपनाकर कई लोगो को पर्यावरण के प्रति जागरूक किया है।

बनाई इको फ्रैंडली ईट

नेहा ठाकुर जो की चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी से मास्टर ऑफ इंजीनियरिंग की शिक्षा प्राप्त कर चुकी हैं और आज के समय में वह एक इंजीनियरिंग कॉलेज में प्रोफेसर हैं। नेहा उन युवा पीड़ी में से है जिन्हे पर्यावरण के प्रति अपनी जिमेदारी बखूबी पता है और जो ओरो को भी इसके लिए जागरूक करते है। नेहा ने बेकार मैटेरियल जैसे कागज़, प्लास्टिक, साधारण सीमेंट, नारियल के छिलको से ईको फ्रेंडली ईट बनाई और उसे बाजार में जाकर बेचना भी शुरू किया।

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कम वजन और कम कीमत

नेहा ठाकुर ने जो ईको फ्रेंडली ईट बनाई वह ईट बाकी इटो के बराबर कम वजन की है और मात्र 6 रुपए में खरीदी जा सकती है। नेहा ने ईको फ्रेंडली ईट बनाकर पर्यावरण का ध्यान रखते हुए साथ ही साथ ज्यादा से ज्यादा लोग इसे खरीदे उसका भी ध्यान रखा है। और ऐसा नहीं है की यह ईट वजन में कम होने के कारण सिर्फ कुछ ही जगहों पर इस्तेमाल की जा सकती है, बल्कि इसका प्रयोग फुटपाथ, घर की दीवारें, सुरंगे बनाने आदि के लिए भी प्रयोग किया जा सकता है।

ईको फ्रेंडली ईट के फायदे

सामान्य ईट जहा मार्केट में 10-12 रुपए के बीच में उपलब्ध होती है वही यह ईको फ्रेंडली ईट मात्र 6 रुपए में मार्केट में उपलब्ध है। ईको फ्रेंडली ईट सामान्य ईट से कम पानी सूखने की क्षमता रखती है, जिसका मतलब है कि सामान्य ईट ज्यादा पानी सोखती है और ईको फ्रेंडली ईट कम पानी सोखती है जिससे पानी की भी बचत की जा सकती है। वही अगर वजन की बात की जाए तो सामान्य ईट का वजन 4 किलोग्राम होता ह और वही ईको फ्रेंडली ईट का वजन 3 किलोग्राम के आस पास है।

प्रेरणा..

यह ईको फ्रेंडली ईट ने बहुत सारे लोगो को प्रेरित किया है। जो युवा पीड़ी पर्यावरण को लेकर अपनी जिमेदारियां नहीं समझती है उन्हे भी नेहा की कहानी से प्रेरणा मिली है की उन्हे भी पर्यावरण के प्रति अपनी जिमेदारियो को समझकर ऐसे ही नए तरीकों का अविष्कार करना चाहिए जो पर्यावरण के लिए और लोगो को जागरूक करने के लिए सही हो। आज भी बहुत से लोग ऐसे है जिन्हे पर्यावरण से कोई मतलब ही नहीं है, जब की पर्यावरण को सुरक्षित रखना और अधिक से अधिक पेड़ लगाना मनुष्य की ही ज़िमेदारी है।

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