Tuesday, October 4, 2022

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गरीबी से जूझते पिता ने रिक्शा चलाकर बेटे को पढाया, बेटा IAS अधिकारी बन किया पिता के सपने को पूरा: प्रेरणा

वैसे तो देखा जाए तो जीवन कठिनाइयों से भरा पड़ा है। कुछ लोग कठिनाइयों के आगे घुटने टेक देते हैं तो कुछ लोग अपने संघर्ष से उसे हरा देते हैं। जिंदगी जीने का सही मायने तभी है जब आप जीवन में आई बाधाओं का सामना डटकर करते हैं और उस से पार पाते हैं।

आज बात एक ऐसे रिक्शा चालक पिता के जिसने गरीबी और लाचारी की भीषण समस्या के बीच रिक्शा चला-चलाकर अपने बेटे को आईएएस बनाने के अपने सपनों को पंख दिया। यूं तो हर पिता यह चाहता है कि वह अपने बेटे को पढ़ा लिखा कर एक बेहतर इंसान बनाए। लेकिन जब पिता की आर्थिक स्थिति कमजोर हो तो उसकी यह मंशा कमजोर पड़ जाती है। गरीबी और बेबसी के बीच अपने बच्चे की पढ़ाई तो दूर उन्हें दो जून की रोटी के लिए संघर्ष करना पड़ता है। इसी संदर्भ में काशी के रहने वाले पेशे से रिक्शा चालक नारायण जयसवाल ने अपनी मेहनत और जज्बे से अपने बेटे को आईएएस बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

नारायण जयसवाल (Narayan Jaiswal) काशी से ताल्लुक रखते हैं। उनके बेटे का नाम गोविंद जयसवाल (Govind Jaiswal) है। गोविंद वर्ष 2007 बैच के आईएएस ऑफिसर हैं। वर्तमान में वह गोवा में सेक्रेटरी फोर्ट, सेक्रेटरी स्किल डेवलपमेंट तथा इंटेलिजेंस के डायरेक्टर जैसे तीनों पदों पर तैनात हैं। गोविंद की पत्नी का नाम चंदना है तथा वह एक IPS ऑफिसर है। वर्तमान में वह भी गोवा में हीं कार्यरत हैं।

बेहद बुरे दौर में गुजरी शुरूआती जिंदगी

जिस समय गोविंद सातवीं कक्षा में पढ़ा करते थे उसी समय उनके मां का देहांत हो गया था। पेशे से रिक्शा चालक होने के कारण नारायण की आर्थिक स्थिति बेहद हीं कमजोर थी। वे किसी तरह से दो वक्त की रोटी जुटा पाते थे लेकिन इतनी भीषण समस्या के बावजूद नारायण ने बाधाओं के आगे घुटने नहीं टेके। वे अपने पुराने दिनों को याद करते हुए कहते हैं कि “वह अपने बेटे गोविंद को रिक्शे में बैठाकर स्कूल पहुंचाने जाया करते थे। तब स्कूल के बच्चे गोविंद को देख कर ताना मारते थे, आ गया रिक्शेवाले का बेटा….नारायण जब लोगों से कहते थे कि वह अपने बेटे को एक आईएएस बनाएंगे तो सभी लोग उनका बहुत मजाक उड़ाते थे”। नारायण ने यह भी बताया कि उनके बचे-खुचे जितने भी रिक्शे थे वह बेटियों की शादी में बिक गए। अंत में उनके पास सिर्फ एक रिक्शा बच गया था जिसे चलाकर वह अपने परिवार का भरण-पोषण करते थे।

उन्होंने बताया कि वह 5 लोग एक हीं कमरे में रहते थे। गरीबी इतनी अधिक थी कि पहनने के लिए कपड़े भी नहीं थे। उनकी बहने दूसरों के घरों में बर्तन मांझा करती थी जिसके कारण कई लोग उन्हें ताना मारते थे।

कठिन परिस्थितियों को हराकर बने IAS

पैसे की कमी के कारण गोविंद दूसरे विद्यार्थियों के किताबों से पढ़ाई किया करते थे। ग्रेजुएशन की शिक्षा पूरी करने के बाद गोविंद का लक्ष्य सिविल सर्विसेज था जिसकी तैयारी के लिए वे वर्ष 2006 में दिल्ली चले गए। जब वह दिल्ली जाने लगे, तब उनके पिताजी ने गांव में थोड़ी सी जमीन थी उसे भी बेच डाली। यूपीएससी की अंतिम चरण की परीक्षा इंटरव्यू होने से पहले गोविंद की बहनों ने कहा कि यदि चयन नहीं हुआ तो परिवार का क्या होगा। फिर भी गोविंद ने हिम्मत नहीं हारी और विश्वास के साथ आगे बढ़े। अपनी पढ़ाई का खर्च निकालने के लिए गोविंद ने पार्ट टाइम जॉब भी करना शुरू कर दिया और साथ ही साथ यूपीएससी में सफलता प्राप्त करने के लिए जी तोड़ मेहनत भी करने लगे। घर की स्थिति को देखते हुए गोविंद ने चाय और एक समय का टिफिन भी बंद कर दिया था। गोविंद की कठिन मेहनत रंग लाई और उन्होंने यूपीएससी की परीक्षा में पूरे भारत में 48वीं रैंक हासिल की और अपने पिता के सपने को पूरा कर उनका सर फक्र से ऊंचा कर दिया।

पिता को देते हैं अपनी सफलता का श्रेय

गोविंद अपनी सफलता का श्रेय अपने पिता को देते हैं। वे कहते हैं कि उनके पिता ने यह कभी भी महसूस नहीं होने दिया कि वे एक रिक्शा चालक के बेटे हैं। लाचारी और मजबूरियों के बावजूद भी उन्होंने जिंदगी के हर कदम पर मेरा साथ दिया।

गोविंद ने जिस तरह अपनी कठिन मेहनत से आईएएस अधिकारी बनने के अपने सपने को पूरा किया और उनके पिता ने विपरीत परिस्थितियों के बावजूद भी जिस तरह से उनका साथ दिया वह दोनों हीं प्ररेणास्रोत हैं।

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