Wednesday, October 5, 2022

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भारत में किस तरह हुई फिल्म निर्माण और उसके प्रदर्शन की शुरुआत, लोगों में कैसा था क्रेज: जानिए

भारत में चलचित्र यानी सिनेमा का इतिहास बहुत पुराना है। आज भारतीय सिनेमा जगत विश्व में नाम कमा रहा है लेकिन आपको फिल्म इंडस्ट्री की शुरुआत और उसके यादगार पहले शो के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं होगी।

आइए जानते हैं भारतीय फिल्म इंडस्ट्री की शुरुआत के बारे में।

वर्ष 1896 की 7 जुलाई को मुंबई के टाइम्स ऑफ इंडिया में एक विज्ञापन छापा। उस विज्ञापन में शहरवासियों को सदी के महानतम उपलब्धि और दुनिया के सबसे बड़े चमत्कार को देखने के लिए वाटसन होटल में आमंत्रित किया गया था।

उस विज्ञापन के अनुसार उस शाम को चार अलग-अलग समय पर जनता के सामने प्रस्तुत करने की अनुमति थी। उस चमत्कार को देखने के लिए शो की टिकट ₹1 में उपलब्ध था। आज के जमाने में एक रुपए की भले ही उतनी महत्ता नहीं हो लेकिन उस समय यह एक रुपए ही एक बड़ी रकम थी।

दरअसल उस दिन यह चमत्कार कुछ और नहीं बल्कि उपमहाद्वीप में चलचित्र की पहली प्रदर्शनी थी। आज इसी चलचित्र को हम फिल्म के नाम से जानते हैं। आज बॉलीवुड का गढ़ माने जाने वाली मुंबई को दुनिया के सबसे बड़े फिल्म निर्माण केंद्रों में से एक माना जाता है। हमारे बॉलीवुड में हर साल हॉलीवुड से भी ज्यादा फिल्में बनाई जाती हैं।

वर्ष 1896 कि उस शाम को 6:00 से 10:00 तक चलने वाले 4 शो में दिखाई जाने वाली फिल्म बेहतरीन डायलॉग, नाच गाना और एक्शन वाली नहीं थी। दरअसल यह उस शाम को प्रदर्शित होने वाली सबसे भयानक फिल्म थी जिसका नाम था “अराइवल ऑफ ए ट्रेन”।

इकलौती घटना पर हीं आधारित थी पूरी फिल्म

आजकल के फिल्मों में 2 या 3 घंटे के लिए अलग-अलग घटनाओं को प्रदर्शित किया जाता है लेकिन अब आप यह सोच रहे होंगे कि यह किस प्रकार के फिल्म थी जिसमें एक ही घटना दिखाई गई। आपको यह जानकर काफी हैरानी होगी कि शुरुआती दिनों में ज्यादातर फिल्मों में एक ही घटना के बारे में दर्शाया जाता था।

इस फिल्म को बनाने और भारत में प्रदर्शित करने के पीछे दो फ्रांसीसी भाई लुइ और अगस्त लुमियर का बहुत बड़ा हाथ था। आज भी इनकी कंपनी सिनेमैटोग्राफी का नाम फिल्मों के निर्माण क्षेत्र में इस्तेमाल किया जाता है।

उस शाम को दिखाई जाने वाली फिल्म “द अराइवल ऑफ ट्रेन ला सिओटैट स्टेशन” थी जिसमें एक ट्रेन को स्टेशन में प्रवेश करते हुए दिखाया गया था।

आज के जमाने में भले हीं या फिल्म आपको हैरान करने वाली ना लगे लेकिन जब पहली बार इस सीन को लंदन में बड़े पर्दे पर दिखाया गया था तब उसे देखने वाले दर्शकों को ऐसा लगने लगा कि ट्रेन पर्दे से निकलकर उनकी तरफ आ रही है और कुछ ही पलों में वह हमें कुचलकर निकल जाएगी। इस फिल्म की प्रदर्शनी के दौरान दर्शकों में से कुछ लोग दहशत के कारण सीट से उठकर दरवाजे की तरफ दौड़ पड़े वहीं कुछ महिलाएं तो बेहोश भी हो गई। अफरातफरी के इस माहौल में प्रशासन ने उनकी देखभाल के लिए नर्सों को भी बुलाया।

उस समय की यह फिल्में एक सामान्य दृश्य पर फिल्म अंकित की जाती थी लेकिन उस समय के लोगों के लिए यह बात भी बहुत ज्यादा दिलचस्प थी क्योंकि उन्होंने ऐसी चीज कभी देखी ही नहीं थी।

फिल्म के दिखाए गए थे कई शो

एरिक बार्नो और एस कृष्णा स्वामी की किताब इंडियन फिल्म्स के अनुसार यह फिल्में मुंबई के लोगों के बीच काफी लोकप्रिय हो गई और कुछ ही दिनों बाद 14 जुलाई 1896 मैं मुंबई के नोवेल्टी थिएटर में 3 दिनों तक इन फिल्मों को दोबारा दिखाया जाता रहा।

दर्शकों के बीच बढ़ती दिलचस्पी और उत्साह को देखते हुए लुमियर ब्रदर्स ने नोवेल्टी थिएटर में दर्शकों के लिए कुछ और नई फिल्मों का इंतजाम किया। फिल्म देखने का यह सिलसिला इतना लोकप्रिय हो गया कि बाद में फिल्म देखने वालों के लिए फिल्मों की संख्या 24 कर दी गई।

फिल्म देखने के लिए लोग नोवेल्टी थिएटर पर टूट पड़े और इन फिल्मों को प्रदर्शित करने का सिलसिला 3 दिन के बजाय 1 महीने तक जारी रहा। फिल्मों का क्रेज कुछ इस प्रकार बढ़ गया कि पर्दा करने वाली महिलाएं भी परिवार के साथ फिल्म देखने आने लगी। इन की सुविधा के लिए बॉक्स की व्यवस्था की गई।

फिल्म की भर्ती लोकप्रियता को देखते हुए टिकट की कीमतों में भी बदलाव करके इसे चढ़ाने से लेकर ₹2 तक के विभिन्न सीटों के लिए विभाजित किया गया।

फिल्मों के प्रदर्शन का यह सिलसिला मुंबई में 15 अगस्त 1896 तक चलता रहा।

दर्शकों को लग चुका था फिल्मों का चस्का

फिल्मों का चस्का दर्शकों को कुछ इस प्रकार लगा कि मुंबई के अलावा कोलकाता भी इन आविष्कारों के रूचि का केंद्र बन गया। जहां स्टीवंस ने स्टार थिएटर में अपनी फिल्में दिखाई।

लुईस प्रदर्श वाला फिल्म दिखाने का सिलसिला तो 15 अगस्त 1896 को खत्म हो गया लेकिन दर्शकों को फिल्म देखने का चस्का तो लग गया था इसलिए कुछ ही महीनों बाद 4 जनवरी 1897 मैं मुंबई के गेट ही थिएटर में फिल्मों का नियमित प्रदर्शन शुरू कर दिया गया।

भारत में शुरू किया गया फिल्मों का कारोबार

“70 इयर्स ऑफ इंडियन सिनेमा” (टीएम रामचंद्रन द्वारा संपादित पुस्तक) के अनुसार वर्ष उन्नीस सौ के दौरान एक अन्य निर्माता चार्ल्स पाथे ने भारत में फिल्म व्यवसाय की शुरुआत की। इस फिल्म की खास बात यह थी कि इसमें भारतीय दृश्य सभी दिखाए जाते थे।

इनकी फिल्म की सफलता को देखते हुए कुछ भारतीयों ने भी ऐसे फिल्म बनाने की ओर रुख किया जिनमें एफबी थानावाला, हीरालाल सेन और जिस मदन का नाम बहुत महत्वपूर्ण है।

एफबी थानावाला ने मुंबई के दृश्य और मय्यत को ले जाते हुए लोगों का फिल्मांकन करके प्रस्तुत किया वहीं कोलकाता के रहने वाले हीरा लाल सेन ने रॉयल बायोस्कोप के तहत 7 लोकप्रिय बंगाली नाटकों के विभिन्न दृश्यों को फिल्माया। जे एस मदन और उनकी एलिफिंस्टन बायोस्कोप कंपनी ने नियमित फिल्मों को बनाने का काम शुरू किया।

शुरुआत में बड़े शहरों में इन फिल्मों को प्रदर्शित करना काफी आसान था क्योंकि लोगों को थिएटर में यह दिखा दिया जाता था लेकिन छोटे शहरों कस्बों और गांवों में इन फिल्मों को टेंट लगाकर मैदान में दिखाया जाता था। चलचित्र का यह दौर पूरे भारत में जल्द ही लोकप्रिय हो गया जिसमें सबसे महत्वपूर्ण भूमिका जेफ मदन ने निभाई।

मुंबई के पारसी परिवार से ताल्लुक रखने वाले मदन को थिएटर के प्रति जुनून उन्हें कोलकाता खींच कर ले गया। वहां उन्होंने कोरोनेसन बेहद मामूली किरदारों के साथ अपने करियर की शुरुआत की। धीरे-धीरे वह एक प्रसिद्ध अभिनेता बन गए और फिर 1 दिन ऐसा आया जब उन्होंने थिएटर कंपनी ही खरीद ली। वाह थिएटर के अलावा कई दूसरे कारोबार से भी जुड़े हुए थे जिनमें खाने पीने की चीजें, शराब, दवा बीमा और संपत्ति के लेनदेन जैसे व्यवसाय भी शामिल थे।

वह थिएटर के अलावा दूसरे कारोबार को भी सफलता से चला रहे थे। वर्ष 1902 में जेएफ मदन ने फिल्म निर्माण के लिए उपकरण खरीदे और कोलकाता के बीच एक मैदान में अपना बायोस्कोप दिखाने की व्यवस्था की। फिल्म निर्माण, वितरण और प्रदर्शनी के एक महान साम्राज्य की शुरुआत थी जिसने तीन दशकों में न केवल भारत बल्कि वर्मा और सिलोन में भी अपनी धाक जमाई। इन तीन दशकों में वह 37 सिनेमाघरों के मालिक बन गए।

जिन टेंट में फिल्मों का प्रदर्शन किया जाता था वह 100 फीट लंबा और 50 फीट चौड़ा होता था जिसमें लगभग 1000 लोग आ सकते हैं। अब्दुल अली युसूफ इन फिल्मों को लंदन से मंगवाते थे और एक सौ में 40 से 50 फिल्में दिखाते थे। इन फिल्मों में कॉमिक्स, ओपेरा, यात्रा फिल्में और खेल प्रतियोगिताएं शामिल थी। इन्हीं दौर में महारानी विक्टोरिया के अंतिम संस्कार और लड़ाई के दृश्य पर आधारित फिल्में भी दिखाई गई जो काफी लोकप्रिय भी हुई।

वर्ष 1914 में अब्दुल अली युसूफ ने एक पार्टनर के साथ मिलकर मुंबई में अलेक्जेंड्रा सिनेमा खरीदा और 1918 में मैजेस्टिक सिनेमा का निर्माण किया। वर्ष 1931 में उपमहाद्वीप की पहली पोर्न फिल्म “आलम आरा” प्रदर्शित की गई।

Amit Kumar
Coming from Vaishali Bihar, Amit works to bring nominal changes in rural background of state. He is pursuing graduation in social work and simentenusly puts his generous effort to identify potential positivity in surroundings.

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