Tuesday, October 4, 2022

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बाल्टी में रसगुल्ले बेचने से लेकर 1000 करोड़ का ब्रांड खड़ा करने तक का सफ़र, जानिए Bikanervala ब्रांड के सफ़लता की कहानी

कहा जाता हैं की हर सक्सेस कहानी के पीछे कोई न कोई कहानी जरूर होती हैं आपने ‘बीकानेर’ के बारे में तो जरूर सुना होगा जो आज एक ऐसा ब्रांड जो अब काफी मशहूर हो चुका है। जिसे बच्चा–बच्चा जनता हैं।क्या जानते है? आपबीकानेर की कहानी के बारे में आज हम आपको बताएंगे की बीकानेर के प्रोडक्ट कैसे मशहूर हुए।

बीकानेर इसका हर एक प्रोडक्ट चाहे वो नमकीन हो, मिठाईयां हो, स्नैक्स हो आदि इनका टेस्ट काफी लाजवाब होता हैं। ‘बीकानेर’ का सफर 1955 से शुरू हुआ। जिसे दिलाने का श्रेय 83 साल के लाला केदारनाथ अग्रवाल (काका जी) और उनके परिवार को जाता है। बीकानेर का सफर तब शुरू हुआ जब वह अपने भाई के साथ बीकानेर से दिल्ली आके रहने लगे और तब उनके पास रहने के लिए कोई जगह नहीं थी उन्होंने कही राते धर्मशाला में भी बिताई है। रोटी खानें के लिए और गुजारा करने के लिए उन्होंने कुछ कारोबार करने का सोचा।

  • कुछ ही दिनों के लिए रुकने दिया धर्मशाला में…

दिल्ली में केदारनाथ और संतलाल खेमका वे दोनो भाई ही थे जो उस समय धर्मशाला में रहते थे लेकिन उस समय धर्मशाला में केवल 3 दिन के लिए ही रहने दिया जाता था। परंतु उस समय वह बीकानेर के जानकार से धर्मशाला में एक महीने के रुकने के लिए एक सिफारिश चिट्ठी लिखवा कर आए थे। शुरुवाती दिनों में दोनो भाईयो ने कड़ी मेहनत की क्या आप जानते है की पैसे कमाने के लिए इन्होंने रसगुल्ले को बाल्टी में डाल के बेचा और कागज़ की पुड़िया बना कर नमकीन बेचनी शुरू की और लोगो को इनका टेस्ट लाजवाब लगने लगा। जिसके बाद दिल्ली वाले लोगो को बीकानेर के प्रोडक्ट पसंद आने लगे साथ ही साथ उन्होंने एक दुकान किराये पर ली, और वह पे अपना काम शुरु किया।

Bikanervala Kedarnath Agrawal
  • बड़ने लगी बीकानेर की डिमांड…

उन्होंने दिल्ली वालो को मूंग दाल का शुद्ध देसी घी में बना हलवा चखाया। जिसकी लोगो ने खूब तारीफ की । धीरे–धीरे उनका काम बड़ने लगा, वे किराये पर उन्होंने एक दुकान भी खरीदी और काम बड़ने के साथ–साथ उन्हे कारगारो की जरूरत पड़ने लगी तभी उन्होंने बीकानेर से कुछ कारीगरो को भी बुलाया। धीरे–धीरे काम रफ्तार पकड़ने लगा वे दिवाली भी नजदीक आने लगी जिसमे बीकानेर की मिठाईयां काफी मशहूर होने लगी और बिकने लगी। डिमांड इतनी बड़ गई की उन्होंने ये नियम बना दिया की वह हर एक आदमी को 10 से ऊपर रासगुले नही देंगे।

काम इतना बड़ने लगा को सन 2003 में बीकानेरवाला कंपनी ने बिकानो चाट कैफे खोलने का सोचा जो आम तौर पर एक फास्ट फूड रेस्टुरेंट होगा।

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  • कैसे हुआ नाम का आरंभ….

1955 में शुरू हुआ ‘बीकानेर’ आज एक ब्रांड बन चुका हैं। जिसका ट्रेड मार्क था BBB यानि बीकानेर भुजिया भंडार। जब उनके भाई जुगल किशोर अग्रवाल दिल्ली पहुंचे। तो उनको यह नाम पसंद नही आया और वे बोले की तुमने ये कैसा नाम रखा जिसके बाद उन्होंने उन्हे सुझाव दिया और नाम बदलने को कहा है। जिसके बाद नाम रखा गया ‘Bikanervalla’ ‘ ‘बीकानेरवाला’ 1956 और आज तक यही ट्रेड मार्क चलता आ रहा है।

1956 में ‘बीकानेर’ का ठिकाना सबसे पहले दिल्ली में नई सड़क पर हुआ। 1962 में मोती नगर में दुकान खरीदी, 1972–1973 में वो दुकान खरीदी जो आज ‘बीकानेर’ की सबसे मशहूर दुकानों में से एक मानी जाती है।

Bikanervala Kedarnath Agrawal

आज ‘बीकानेर’ एक ऐसा नाम बन चुका। जहा हर चीज मिलती हैं और उसका स्वाद लाजवाब होता है देशभर और दुनिया में ‘बीकानेर’ और बीकानो के नाम से 200 दुकानें हैं।अमेरिका, दुबई, न्यू जीलैंड, सिंगापुर, नेपाल आदि देशों में भी ‘बीकानेरवाला’ पहुंच गया है। काका जी बताते हैं कि आज दो हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का टर्नओवर है।

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  • प्रेरणा….

क्या कभी केदारनाथ ने सोचा था की उनका एक बाल्टी में बेचे हुए रसगुल्ले और नमकीन का काम इतना चलेगा की वो एक ब्रांड बन जाएगा जो काफी मशहूर हो जायेगा। जिससे घर में आने वाले मेहमानों को भी खिला जायेगा।

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