Tuesday, October 4, 2022

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कच्चा मकान, पिता मजदूर, खुद सब्ज़ी का ठेला लगाए, 9 बार भी असफल होने के बाद नहीं माने हार और बन गए जज

कहते हैं जब कोई इंसान सच्चे मन से कुछ ठान के करना चाहे तो सारी कायनात उसे उसकी मंजिल तक पहुंचाने में लग जाती हैं, ऐसे ही जब कोई इंसान सच्चे दिल से और लगन से मेहनत करता है तो एक न एक दिन कामयाबी उसके कदम चूमती ही हैं।

आज एक ऐसी ही व्यक्ति की कहानी जिसने अपने लक्ष्य से कदम पीछे नहीं हटाए और काफी संघर्ष के बाद उनका सपना सच हुआ साथ ही साथ सबके लिए प्रेरणा बने।

शिवाकांत कुशवाहा (Shivakant Kushwaha)….

जी हां आज हम बात कर रहें है शिवाकांत कुशवाहा (Shivakant Kushwaha) जो मध्य प्रदेश Madhya Pradesh) के सतना (Satna) जिले के अमरपाटन (Amarpatan) के रहने वाले हैं। यह वो व्यक्ति है जिन्होने अपने सपनो को पूरा करने के लिए काफी प्रयास वे संघर्ष किया। शिवकांत के परिवार में दो भाई और एक बहन है जिसमे शिवकांत दूसरे नंबर पर है वह इनके पिता का नाम कुंजीलाल कुशवाहा और माता का नाम शकुन बाई कुशवाहा है, इनके पिता मजदूर का काम करते है वही माता भी घर खर्च चलाने के लिए काम किया करती थी घर में पैसो की तंगी होने के कारण उनका घर खर्च काफी मुश्किल से चला करता था

शिक्षा में थी काफी रुचि…

शिवकांत को बचपन से ही पढ़ने–लिखने का काफी शौक था वह बचपन से ही हमेशा कुछ बड़ा बनना चाहते थे वह साथ ही साथ अपने माता–पिता का नाम रोशन करना चाहते थे पर घर में आर्थिक स्थिति ठीक ना होने के कारण उसका असर उनकी पढ़ाई पर पड़ता था। इसी स्थिति को संभालने के लिए उन्होंने सब्जी का ठेला लगाना शुरू किया । और अपनी 12 की शिक्षा ग्रहण की जिसके बाद उन्होंने बरीवा के टी एस कॉलेज यानी ठाकुर रणमत सिंह महाविद्यालय से एलएलबी (LLB) की पढ़ाई पूरी की।

Vegetable Seller Shivkant Kushwaha Became Civil Judge

सब्जी वाले से जज बनने का सफर…

एक सब्जी लगाने वाला व्यक्ति जो अब सिविल जज बन चुका है। जिसके लिए यहां तक पहुंचना कितना मुश्किल और कठिन सफर था। क्युकी आप सब जानते होंगे की सिविल जज की पढ़ाई करना कितना मुश्किल है और साथ काम करके पढ़ाई करना नामुमकिन परंतु, यह सब नामुमकिन को मुमकिन कर दिखाया शिवकांत ने।

एक बेटे ने किया मां का सपना पूरा….

हर मां चाहती हैं की मेरा बेटा बड़ा होकर काफी तरीके करे और अच्छा इंसान बने। ऐसे ही एक सपना शिवकांत की मां ने देखा था वो भी चाहती थी की मेरा बेटा बड़ा होकर कुछ बन के दिखाए। उन्होंने भी अपने बेटे के संघर्ष में काफी साथ दिया वह भी घर खर्च चलाने के लिए घर के काम किया करती थी। परंतु, जिस मां ने अपने बेटे के लिए सपना देखा था वही मां अपने बेटे को जज बनता नही देख सकी क्युकी वह कैंसर की बीमारी से लड़ रही थी और वर्ष 2013 में उनका निधन हो गया था।

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करते थे काफी घंटो तक पढ़ाई…

शिवकांत अपने सपने को सच करने के लिए किसी भी चीज को अपनी बाधा नहीं बनने देते थे। वह दिन 20से24 घंटे पढ़ाई किया करते थे और अपनी पढ़ाई में कभी भी किसी तरह की कोई कमी नी आने दी । घर छोटा होने के कारण उनके घर में जगह की कमी हुआ करती थी परंतु, फिर भी वह पढ़ने के लिए दूसरे के घर चले जाते थे

सपना हुआ साकार….

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शिवकांत जो की सब्जी का ठेला लगाया करते थे अब वह सिविल जज बन चुके है उनके लिए अपने सपने को साकार करना बिल्कुल आसान नहीं था परीक्षा में 9 बार असफल होने पर भी उन्होंने उम्मीद नहीं छोड़ी और अपने लक्ष्य पर चलते रहे। 10 बार जब वो परीक्षा में सफल हुए तो वो इतने हैरान थे की उन्हे यकीन तक नही हो रहा था की उनका सिलेक्शन सिविल जज के तौर पर हो चुका है और वह ओबीसी श्रेणी में द्वितीय स्थान प्राप्त किए है। लोगो को दुख में तो आंसू आते ही आते पर खुशी पर भी आंसू आते है और यही आंसू हमने शिवकांत की आंखों में देखे इसी खुशी से घर में पूरा वातावरण खुशनुमा हो गया था परिवार ही नहीं पूरे गांव मोहल्ले में खुशियों की लहर गूंज रही थी

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प्रेरणा….

शिवकांत ने एक सपना देखा था जिसे उन्होंने पूरा भी किया। परंतु क्या ये सब कर पाना उनके लिए आसान था? जी नहीं बिलकुल नहीं क्युकी एक मध्य वर्ग से तालुक रखने वाले व्यक्ति जो सब्जी बेचा करते थे उनके लिए यह करना काफी मुश्किल था जिनके पास कोचिंग लेने तक के पैसे नहीं थे जिन्होने अपनी पढ़ाई खुद की और 9 बार असफलता प्राप्त करने के बाद भी उन्होंने हार नही मानी और आखिर में उन्होंने अपनी जिद से सफलता प्राप्त की।आज शिवकांत जो मध्य परिवार से होकर बिना किसी सुख सुविधा के उन्होंने यह सपना साकार किया और लोगो को प्रेरित किया। वही दूसरी तरफ ऐसे लोग है जिनके पास जिंदगी की सारी सुख सुविधा है पर फिर भी वे जिंदगी में कुछ नही बन पाए ऐसे लोगो को शिवकांत से प्रेरणा लेकर उनके लक्ष्य कदम पर चलना चाहिए।

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